दुनिया की सबसे बड़ी वायुसेना: केवल 28.5% F-35A मिशन रेडी

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अमेरिकी वायुसेना का F-35A: मिशन-सक्षमता दर में सुधार लेकिन चुनौतियाँ बरकरार

अमेरिकी वायुसेना के F-35A विमानों ने वित्तीय वर्ष 2025 में सभी F-35 वेरिएंट में सबसे अधिक पूर्ण मिशन-सक्षमता दर दर्ज की है। हालांकि, एक नई सरकारी जवाबदेही कार्यालय (GAO) रिपोर्ट के अनुसार, किसी भी समय केवल 28.5 प्रतिशत विमान ही सभी निर्धारित मिशनों को अंजाम दे सकते हैं। यह आंकड़ा अमेरिकी सेना की स्टील्थ क्षमता और लड़ाकू तत्परता को लेकर चिंता बढ़ाता है।

F-35 विमानों की मरम्मत और रखरखाव में देरी

GAO रिपोर्ट में बताया गया है कि F-35 फ्लीट में मरम्मत और रखरखाव का काम धीमा है। कई विमान स्पेयर पार्ट्स की कमी के कारण जमीन पर खड़े रहते हैं। F-35A लड़ाकू विमानों की पूर्ण मिशन-सक्षमता दर 28.5 प्रतिशत है, जबकि F-35B और F-35C वेरिएंट के लिए यह आंकड़ा क्रमशः 15 प्रतिशत और 21 प्रतिशत है। यह दर्शाता है कि कुल मिलाकर सिर्फ एक-चौथाई विमान ही पूरी तरह से तैयार हैं। रिपोर्ट के अनुसार, F-35 विमानों के इंजन और सेंसर सिस्टम में बार-बार खराबी आती है। इससे विमानों की उड़ान के समय में कमी आई है। अमेरिकी रक्षा विभाग ने इस समस्या के समाधान के लिए 2024 में एक नई रखरखाव योजना शुरू की थी।

स्टील्थ क्षमता और लागत बढ़ने की चिंता

F-35 विमानों की स्टील्थ क्षमता उनकी सबसे बड़ी खूबी है। लेकिन रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि कई विमानों पर स्टील्थ कोटिंग खराब हो गई है। इससे दुश्मन के रडार पर पकड़े जाने का खतरा बढ़ गया है। इसके अलावा, F-35 प्रोग्राम की लागत लगातार बढ़ रही है। 2025 तक इस कार्यक्रम पर कुल 1.7 ट्रिलियन डॉलर खर्च होने का अनुमान है। GAO ने चेतावनी दी है कि यदि रखरखाव और अपग्रेडेशन में देरी हुई, तो यह लागत और बढ़ सकती है। अमेरिकी रक्षा विभाग अब F-35 के नए संस्करण (F-35 ब्लॉक 4) पर काम कर रहा है। लेकिन इसके लिए भी अतिरिक्त धन और तकनीकी सुधारों की जरूरत है।

भारतीय वायुसेना और F-35: क्या सबक ले सकती है भारत?

भारतीय वायुसेना वर्तमान में राफेल और सुखोई जैसे लड़ाकू विमानों का उपयोग करती है। F-35 की समस्याओं से भारत को संभावित लाभ हो सकता है। F-35 की रखरखाव चुनौतियों ने यह साबित किया है कि तकनीकी जटिलता के कारण विमानों की उपलब्धता कम हो सकती है। भारत को अपने स्वदेशी लड़ाकू विमान कार्यक्रम, जैसे टेजस और एएमसीए (Advanced Medium Combat Aircraft), पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। भारत में लड़ाकू विमानों के आधुनिकीकरण के लिए रखरखाव का मजबूत बुनियादी ढांचा आवश्यक है। भारत को F-35 के टिकाऊ और किफायती विकल्पों पर विचार करना चाहिए।

सरकारी प्रतिक्रिया और भविष्य की योजनाएँ

अमेरिकी रक्षा विभाग ने GAO रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि वे रखरखाव प्रक्रियाओं में सुधार के लिए प्रतिबद्ध हैं। अमेरिकी वायुसेना प्रमुख जनरल डेविड एल्विन ने कहा कि F-35A विमानों की मिशन-सक्षमता दर 2026 तक 40 प्रतिशत तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए 2025 में नए स्पेयर पार्ट्स और मरम्मत केंद्रों का निर्माण किया जाएगा। GAO ने सिफारिश की है कि अमेरिकी रक्षा विभाग F-35 फ्लीट के लिए एक स्पष्ट रखरखाव लक्ष्य निर्धारित करे। साथ ही, विमानों के अपग्रेडेशन के लिए एक समयसीमा भी तय करे। भारत जैसे देशों को इस रिपोर्ट से सीख लेते हुए अपने लड़ाकू विमान बेड़े की तत्परता बढ़ानी चाहिए।

निष्कर्ष

F-35A विमानों की पूर्ण मिशन-सक्षमता दर में सुधार हुआ है, लेकिन यह अभी भी अपेक्षित स्तर से कम है। अमेरिकी वायुसेना को रखरखाव और लागत की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। भारत को अपने लड़ाकू विमान कार्यक्रम में इन सबकों को शामिल करना चाहिए। स्वदेशी तकनीक और मजबूत रखरखाव बुनियादी ढांचा ही भविष्य की कुंजी है। यह रिपोर्ट दर्शाती है कि स्टील्थ लड़ाकू विमानों की तैयारी में सुधार के लिए निरंतर प्रयास आवश्यक हैं।
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